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    अमेरिका ने रूस से भारत की तुलना में ज्यादा खरीदा कच्चा तेल, अब दूसरों को दे रहा नसीहत

  • May 01, 2022

    नई दिल्ली रूस (Russia) की ओर से यूक्रेन (Ukraine ) पर किए गए हमले के बाद से अमेरिका (America) बाकी देशों को मॉस्को के साथ व्यापार नहीं (no trade with moscow) करने की हिदायत देता रहा है। कई देशों ने रूस के साथ संबंध के लिए अपने कदम भी पीछे खीचे हैं। इस बीच रूस ने भारत (India) को सस्ते में कच्चा तेल खरीदने का ऑफर (Offer to buy crude oil cheaply) दिया तो अमेरिका इंडिया पर भड़क उठा था, लेकिन अब अब थिंक टैंक सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की एक रिपोर्ट सामने आई है जिसमें बताया गया है कि यूएस ने भारत की तुलना में रूस से अधिक ईंधन खरीदा है।

    रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यूक्रेन के खिलाफ युद्ध शुरू होने से बाद भारत ने रूस से जितना कच्छा तेल खरीदा है अमेरिका उससे कही ज्यादा तेल खरीद चुका है। रूस के कच्चे तेल निर्यातकों की सूची में पहले भारत का 20 स्थान है जबकि अमेरिका दो पायदान ऊपर मतलब 18वें नंबर पर है।


    जर्मनी पहले स्थान पर
    यूक्रेन में युद्ध शुरू होने के बाद रूस से कच्चा तेल खरीदने के मामले में जर्मनी पहले स्थान पर हैं। दूसरे नंबर पर इटली है। तीसरे नंबर पर चाइना, चौथे नंबर पर नीदरलैंड्स और पांचवें नंबर पर तुर्की है। छठे नंबर पर फ्रांस, सातवें नंबर पर बेल्जियन, आठवें नंबर पर स्पेन, नौवें नंबर पर साउथ कोरिया और दसवें नंबर पर पोलैंड है।

    अधिकारियों ने कहा- ऑफर का कोई खास लाभ नहीं मिला
    रूस से सत्ते में कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत के अधिकारियों ने कहा कि मॉस्के के डिस्काउंट का भारतीय खरीदारों पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। अधिकारियों ने कहा कि रूस के ऑफर में कहा गया कि पहले डिलीवरी ले लीजिए फिर शिपिंग कराइए। अधिकारियों ने कहा कि ऐसे में भारतीय तेल खरीदारों को शिपिंग चार्ज, इंश्योरेंस और वॉर प्रीमियम देना होगा। जिसकी वजह से भारी डिस्काउंट का कोई मतलब नहीं बचता है।

    जंग के बाद से रूस पर लगे हैं कई तरह के प्रतिबंध
    दरअसल, यूक्रेन के खिलाफ जंग छेड़ने के बाद रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं। ऐसे में रूस ने भारत को सस्ता तेल खरीदने का ऑफर दिया। रूस के ऑफर के बाद रिलायंस समेत कुछ और कंपनियों ने कुल 30 मिलियन बैरल कच्चा तेल खरीदा। भारतीय की ओर से रूस से कच्चा तेल खरीदे जाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन समेत कई यूरोपियन लीडर ने इसका विरोध किया था।

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