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SC द्वारा कैश कांड की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करना खतरनाक ट्रेंड, संसद में बोले कपिल सिब्बल

  • March 31, 2025

    नई दिल्‍ली । राज्यसभा सदस्य (Rajya Sabha Member)और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कपिल सिब्बल(Chairman Kapil Sibal) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)द्वारा जस्टिस यशवंत वर्मा (Justice Yashwant Verma)के घर से बरामद जले हुए कैश के मामले में आंतरिक जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सिब्बल ने इसे खतरनाक उदाहरण करार दिया और कहा कि इस तरह की कार्रवाइयों से संस्थान की प्रतिष्ठा को नुकसान हो सकता है।


    आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 22 मार्च को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी एस संधवाला और कर्नाटक हाईकोर्ट की न्यायाधीश अनु शिवरामन की तीन सदस्यीय समिति का गठन किया, जो जस्टिस वर्मा के मामले की जांच करेगी।

    इसके अलावा, दिल्ली हाईकोर्ट की आंतरिक जांच रिपोर्ट को भी सार्वजनिक किया गया जिसमें वीडियो और तस्वीरें भी शामिल हैं, जिन्हें दिल्ली पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा ने दिल्ली के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय के साथ शेयर किया था।

    सिब्बल ने कहा, “यह उनके विवेक पर निर्भर करता है। यह सही था या गलत, यह समय ही बताएगा। दस्तावेज का स्रोत खुद कोर्ट है और फिर लोग इसे सही मानने लगते हैं। मेरे अनुसार यह एक खतरनाक उदाहरण है। संस्थागत प्रतिक्रिया एक ऐसा तंत्र होना चाहिए जो संस्थान को यह लिखित रूप में बताना चाहिए कि क्या किया जाना चाहिए।”

    सिब्बल ने आगे कहा, “ईमानदारी से कहूं तो यह बात बार के साथ परामर्श करके तय की जानी चाहिए। हम जितना न्यायाधीशों के बारे में जानते हैं वे भी उतना ही जानते हैं। ऐसी बातों पर चर्चा करने के लिए एक व्यापक समिति होनी चाहिए और फिर उन मुद्दों को हल करने के लिए एक तंत्र होना चाहिए। अगर आप ये चीजें सार्वजनिक डोमेन में डाल देंगे तो संस्थान पहले ही हार चुका है।”

    जस्टिस वर्मा के मामले पर सिब्बल ने कहा, “जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती मुझे नहीं लगता कि भारत का कोई जिम्मेदार नागरिक इस पर टिप्पणी करना चाहिए। जस्टिस वर्मा को दोषी मानकर बार को भी हड़ताल नहीं करना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि इस देश में यह सिद्धांत बना रहेगा कि जब तक किसी को दोषी नहीं ठहराया जाता तब तक उसे निर्दोष माना जाएगा। इस मामले में तो जांच भी पूरी नहीं हुई है।”

    हालांकि सिब्बल ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों पर संस्थागत प्रतिक्रिया आवश्यक है और इसे लागू करने के लिए तंत्र की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, “न्यायपालिका से जुड़े मुद्दे बहुत गंभीर हैं। तीन प्रकार की समस्याएं हैं। एक तो वित्तीय भ्रष्टाचार है। उसे संभालने के लिए कोई तंत्र नहीं है। फिर यौन दुर्व्यवहार के आरोप हैं। तीसरी समस्या यह है कि कुछ न्यायाधीश खुले तौर पर राजनीतिक विचारधारा से जुड़े हुए हैं। यह जस्टिस अभिजीत गांगोपाध्याय और जस्टिस शेखर यादव के मामलों में देखा जा सकता है। वर्षों से न्यायपालिका इन मुद्दों का संस्थागत रूप से उत्तर नहीं दे रही है और यह बहुत चिंताजनक है।”

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