इंदौर। ब्लड कैंसर के जिन मरीजों का बोनमैरो ट्रांसप्लांट नहीं हो सकता या जिनका बोनमैरो ट्रांसप्लांट फैल हो गया हो , उनके लिए टी – सेल थेरेपी यकीनन किसी संजीवनी से कम नही है। मध्य प्रदेश में पहली बार इस थेरेपी का इस्तेमाल इंदौर के सरकारी हॉस्पिटल सुपर स्पेशलिटी में किया गया। इसके अलावा यह थेरेपी, एक्यूट लिम्फो ब्लास्टिक ल्यु केमिया और नॉन हॉज किन्स लिम्फोमा बीमारी से पीडि़त मरीजों के लिए भी किसी वरदान से कम नही है।
इस थैरेपी के माध्यम से गुना के 22 वर्षीय ब्लड कैंसर से पीडि़त मरीज यह इलाज क्लिनिकल हेमेटोलॉजी, ट्रांसफ्यूजन मेडिसीन एवं बोनमैरो ट्रांसप्लांट विभाग की देख-रेख में किया जा रहा है। इस अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीक को संयुक्त रूप से आईआईटी मुंबई और टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल ने इजाद किया है। सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में भर्ती मरीज को टी – सेल की थेरेपी फोर्टिस चिकित्सालय के प्रमुख हेमेटोलॉजिस्ट डॉक्टर राहुल भार्गव की मौजूदगी में दी गई।
विदेश में 4 करोड़, निजी में 40 लाख का खर्च
विदेशो में इस टी – सेल थेरेपी के इलाज में 4 करोड़ रुपए और अपने देश के निजी हॉस्पिटल में 40 लाख रुपये तक का खर्च आता है। क्लिनिकल हेमेटोलॉजी विभाग के हेड, डॉ. अक्षय लाहोटी ने बताया कि फोर्टिस अस्पताल के प्रमुख हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. राहुल भार्गव, सहित एम वाय हॉस्पिटल सुपर स्पेशलिटी के अधीक्षक सहित कैंसर हॉस्पिटल के विशेषज्ञ इस थैरेपी के दौरान मौजूद थे।
आखिर क्या होती है यह टी सेल थैरेपी
डॉ. अक्षय लाहोटी सहित डॉ. सुधीर कटारिया ने बताया टी सेल थेरेपी में सफेद रक्त कोशिकाओं को हटाने के लिए मरीज पर एफेरेसिस प्रक्रिया की जाती है। एक सामान्य रोगी के रक्त में दो प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकाएं यानी बी और टी कोशिकाएं होती हैं। इनमें टी कोशिकाओं को श्वेत रक्त कोशिकाओं से अलग किया जाता है। इसके बाद वायरल वैक्टर की मदद से उन्हें अनुवंशिक रूप से संशोधित किया जाता है। इन अनुवंशिक रूप से संशोधित कार-टी कोशिकाओं को रोगी में डाला जाता है। काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर, कैंसर कोशिकाओं की सतह पर विशिष्ट प्रोटीन की पहचान करता है और उन्हें नष्ट कर देता है। इस तरह टी कोशिकाएं मरीज के शरीर से कैंसर को खत्म कर देती हैं और मरीज कैंसर मुक्त हो जाता है।
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