53 साल पहले की वही तारीख… जब केवल अपनी तारीफ की खातिर हमने अपने हजारों जवानों की कुर्बानी दे डाली… जीत का तमगा लगाया और दुनिया को भारत के भारत होने का एहसास कराया… लेकिन उस जीत की हार का मतलब आज समझ में आया… जब हमारे जेहन में यह सवाल उठकर आया कि हमने क्यों बांग्लादेश के फटे में पांव अड़ाया… क्यों हमें बांग्लादेशियों की हालत पर तरस आया… क्यों हमने उनकी खातिर यह कदम उठाया… यह हमारी नादानी ही तो थी कि मरते बांग्लादेशियों और जुल्म ढाते पाकिस्तानियों और उनसे आंख फेरते दुनिया वालों से अलग हटकर हमने अपनी सेना को पाकिस्तान में घुसाया…बांग्लादेश को आजाद कराकर मुल्क उनके ही हाथों में सौंपने का परिणाम आज सामने आया…एहसान फरामोश बांग्लादेशी हमारे अपनों पर जुल्म ढहा रहे हैं… जिन्हें हमने आजाद कराया था… आजादी से जीने का हक दिलाया था… केवल आजादी ही नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी को आसान बनाने के लिए…उनकी भूख मिटाने के लिए… उनके रोजगार बढ़ाने के लिए… उनकी बीमारी मिटाने के लिए अनाज के भंडार भिजवाए… काटन भेजकर कपड़ा मिलें चलवाईं…अस्पताल और दवाइयों की कतार लगाई और कभी पलटकर भी अपनी रहनुमाई की कीमत नहीं लगाई…लेकिन वही बांग्लादेशी आज हिंदुओं पर कहर ढहा रहे हैं…उन्हें जबरिया मुसलमान बना रहे हैं…उनके घरों को छीनकर ताकत दिखा रहे हैं…महिलाओं और बच्चों को बेदखल कर अपनी औकात पर दिखा रहे हैं और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं…उनकी आजादी के लिए यदि हमारे फौजियों ने कुर्बानी दी तो हमारी सरकार ने नादानी दिखाई…पाकिस्तान के टुकड़े करने का और बांग्लादेश को जन्म देने का जख्म आज भी पाकिस्तान और उसकी अवाम के दिल में नासूर बनकर उभरता है… कश्मीर तो केवल बहाना है… उसे बांग्लादेश छीनने की कीमत चुकाना है…एक गलत नीति ने अपनी नियति में दुश्मनी का भविष्य ठूंस दिया… इधर बांग्लादेश हमारा दुश्मन बना बैठा है… उधर पाकिस्तान का दर्द हमें जख्म दे रहा है और हम न तब किए गए युद्ध का कारण समझ पा रहे हैं और न आज की खामोशी की वजह जान पा रहे हैं… बस इतना ही समझ पा रहे हैं कि गद्दार कभी वफादार नहीं होता… लम्हे की खता कौन सदियों तक ढोता है… कुर्बानियों की कीमत का कोई मोल नहीं होता…
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