उज्जैन। दो साल से ठंडे पड़े मटके के कारोबार में भी इस साल तेजी आ गई है। शहर में इन दिनों कई जगह मटकों की दुकानें नजर आने लगी हैं, लेकिन महंगाई का असर मटकों के दामों पर भी नजर आ रहा है। बावजूद इसके इस साल उम्मीद से अच्छा बाजार है। शहर में मटकों की आवक शहर के आसपास के साथ ही गुजरात और यूपी से हो रही है। गर्मी से महीनों पहले ही सीजन के लिए तैयारियां शुरू हो जाती हैं। दो साल कारोबार ठंडा होने के बाद इस साल शहर में कई नई वैरायटी के मटके मौजूद हैं। गर्मी बढ़ते ही लोगों ने मटकों की खरीदारी तेज कर दी है। इंदौर रोड और फाजलपुरा क्षेत्र में कारोबार कर रहे व्यापारियों का कहना है कि दो साल बाद व्यापार में तेजी आई है। लोगों के बीच मांग भी अच्छी है। जिन्होंने दो साल मटके नहीं खरीदे, वो मटका खरीदने के लिए आ रहे हैं। गर्मी के बढ़ते ही मांग भी बढ़ी है, लेकिन महंगाई ने हमारा मार्जिन कम कर दिया है। दो साल से ठप पड़े कारोबार को फिर से गति देने के लिए हम कम मार्जिन पर भी व्यापार कर रहे हैं। पिछले दो साल में तो लागत तक नहीं निकाल पाए।
समय के साथ बदली डिजाइन
समय और लोगों की पसंद को देखते हुए पिछले कुछ सालों में मटकों की डिजाइन और स्वरूप में भी बदलाव आया है। मटकों को स्टाइलिश लुक दिया जा रहा है। रंग-बिरंगे मटकों पर अलग-अलग तरह की डिजाइन की गई है। मटकों के अलावा मिट्टी के बर्तन, सुराही, मिट्टी की बोतलें भी अलग-अलग डिजाइन में इस साल मौजूद हैं। मटके बेच रहे बसंत प्रजापति ने बताया कि हर मटके पर करीब 30 से 40 रुपए बढ़े हैं। शहर में अहमदाबाद, मोरबी, कानपुर और आसपास के शिप्रा, खातेगांव और भौंरासा से ज्यादा मटके आते हैं। गुजरात से रंगीन और उस पर डिजाइन किए मटके आते हैं। मोरबी से आने वाले मटके मशीनों से ही बनते हैं और मशीनों में ही पकाए जाते हैं। लोग अब बजाय फ्रिज का पानी पीने के मटके के पानी को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं। कई रसोईघरों से हटे मटके अब फिर रसोईघरों में नजर आने लगे हैं।
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