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चीन की उल्टी पड़ गई चाल, निशाने पर थीं गौरैया और मर गए 4.5 करोड़ लोग

  • March 20, 2025

    डेस्क: क्या घरों और बगीचों में चहचहाने वाली गौरैया भी नुकसान पहुंचा सकती है? चीन में तो इन्हें मारने के लिए बहुत बड़ा अभियान चलाया गया. लाखों गौरैया को निशाना बनाया गया. चीन में माओत्से तुंग के आदेश के बाद इनका कत्लेआम शुरू हुआ. इनकी संख्या इतनी तेजी से कम हुई कि देश में भुखमरी के हालात बन गए. जब तक चीनी सरकार को इस बात का अहसास हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

    आज गौरेया का जीवन संकट में है. इनकी घटती आबादी के कारण इन्हें संरक्षित करने के लिए हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है. इस मौके पर जानिए, चीन ने गौरैया को खत्म करने का फैसला क्यों लिया और उस फैसले का हश्र क्या हुआ.

    माओत्से तुंग ने 1957 से 1962 के बीच दूसरी पंचवर्षीय योजना की शुरुआत की. इस दौर को ग्रेट लीप फॉरवर्ड कहा गया. पहली योजना में सफलता मिलने के उत्साहित माओ ने इस बार योजना का दायरा बढ़ा दिया था. लेकिन दूसरी योजना में सफलता नहीं मिली. अपनी असफलता छिपाने के लिए चीनी अफसरों ने तर्क दिया कि मच्छरों, गौरैया और चूहों के कारण देश को हर साल काफी नुकसान होता है. इनसे निपटने के उपाय किए जाने चाहिए. अफसरों ने कहा कि गौरैया सारा अनाज चट कर जाती है. नतीजा, उत्पादन घट रहा है. इसके बाद ही माओ ने इन्हें खत्म करने का आदेश दिया.

    माओ के इस अभियान को ‘द ग्रेट स्पैरो’ कैम्पेन भी कहा जाता है. माओ के आदेश के बाद गौरैया को खत्म करने की होड़ मच गई. अधिकारियों ने तरह-तरह के तरीके अपनाए. छात्राें और नौकरशाहों को मिलाकर 30 लाख लोगों की ऐसी फोर्स बनाई जो सुबह 5 बजते ही गौरैया के साथ सभी छोटे पक्षियों को नेट में फंसाकर गिराना शुरू कर देती. ऊंचे-ऊंचे बांस के सिर पर गोंद लगाकर खड़ा किया ताकि उस पर बैठते ही पक्षी चिपक जाए और दोबारा उड़ने लायक न बचे. पहले ही दिन लाखों गौरैया को मार गिराया गया.


    गौरैया को पूरी तरह से खत्म करने के लिए उनके घोसले नष्ट किए गए. अंडे फोड़ दिए गए. लोग मिलकर इतना शोर करते थे कि गौरैया कहीं बैठ ही नहीं पाती थी. विशेषज्ञों का कहना है, गौरैया के लिए आराम जरूरी होता है. ये बिना आराम किए लम्बे समय तक उड़ नहीं पाती. नतीजा, कई बार ये उड़ते-उड़ते थककर जमीन पर गिर पड़ती थी. गोलियों के जरिए भी इन्हें खत्म करने काम काम किया गया. दो साल के अंदर ऐसा समय आ गया कि लगा चीन में गौरैया अब न के बराबर रह गई हैं.

    चीन के पत्रकार डाई किंग के मुताबिक, इस अभियान का भुगतान पूरे देश को करना पड़ा. जिस अनाज को बचाने के लिए गौरैया का कत्लेआम हुआ, वही अनाज लोगों को नसीब नहीं हुआ. गौरैया खेतों में जाकर उन कीटों को खा जाती थी जो फसलों को नुकसान पहुंचाते थे. गौरैया की संख्या तेजी से गिरने के बाद इन कीटों की संख्या बढ़ी. फसलें बर्बाद होने लगीं. वहीं, टिड्डियों ने भी फसलों पर हमले शुरू कर दिए. नतीजा, चीन में अकाल के हालात बने और अब शुरू हुआ अकाल के कारण लोगों की मौतों का सिलसिला.

    अकाल के कारण हुई मौतों पर भी चीनी सरकार ने पर्दा डालने की कोशिश की. सरकार का दावा था कि मात्र 1.5 करोड़ लोगों की मौत हुई. लेकिन विश्लेषकों का कहना था कि 4.5 करोड़ लोगों ने दम तोड़ा. चीनी पत्रकार यांग ने अपनी किताब टॉम्बस्टोन में दावा किया कि मौतों का आंकड़ा 3.6 करोड़ था. वहीं, कुछ अन्य विश्लेषकों ने मौत के आंकड़े को 7.8 करोड़ बताया. ज्यादातर के आंकड़े सरकारी आंकड़ों के उलट थे. इसे चीनी सरकार का सबसे बुरा अभियान भी कहा जाता है.

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