जातिगत और क्षेत्रीय समीकरण साधते हुये चुने जाएगा नाम, भोपाल के बाद दिल्ली के दिग्गज करेंगे अंतिम फैसला, जनवरी के अंतिम सप्ताह में ऐलान की संभावना, क्षत्रपों के मध्य तालमेल बिठाना संगठन के लिए बड़ी चुनौती
पंडित मदन मोहन अवस्थी, जबलपुर। भाजपा का संगठन पर्व अब नए पड़ाव की ओर अग्रसर है। मंडल अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष की कवायद के बाद पार्टी अपने नए प्रदेशाध्यक्ष के चयन की तैयारियों में जुट गयी है। धीरे-धीरे दावेदारों के नाम सामने आ रहे हैं और उसी तेजी से उनके प्लस-माइनस भी उछाले जा रहे हैं। प्रक्रिया अभी प्राथमिक स्तर पर है,लेकिन अंदर-अंदर भूमिका तय होने की खबरे हैं। प्रदेशाध्यक्ष का चयन दिल्ली से होना तय है, लेकिन प्रदेश के दिग्गज नेताओं की रायशुमारी भी आवश्यक मानी जा रही है ताकि बाद में दरारें दिखाई न दें।
लंबी प्रक्रिया, कई पड़ाव
भाजपा अपने संगठन के चुनाव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए जानी जाती है। विलंब जरूर हो सकता है,लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि कहीं से कभी कोई नाम आया और उसे कुर्सी सौंप दी गयी। प्रदेशाध्यक्ष के चुनाव में भी एक लंबी प्रक्रिया का पालन होगा,जो कई पड़ावों से होकर गुजरेगी और गहन मंथन के बाद नाम की घोषणा होगी। ये जरूर है कि पार्टी जातिगत समीकरण और प्रदेश के क्षेत्रों को बैलेंस करने की कोशिश करेगी। कुछ बड़े क्षत्रप हैं,जो अपने नामों को लेकर सामने हैं, सभी को मनाना-राजी करना भी बड़ी चुनौती है।
अभी जो दौड़ में हैं
दावेदारों की सूची में पहला नाम हेमंत खंडेलवाल का है। अभी तक सबसे मबजूत नाम इस दौड़ में हेमंत खंडेलवाल का माना जा रहा है। बैतूल से विधायक व पूर्व सांसद हेमंत खंडेलवाल इस दौड़ में सबसे आगे हैं। उनकी गिनती लो-प्रोफाइल नेताओं में होती है इसलिए संगठन की पसंद बन सकते हैं। हेमंत खंडेलवाल वर्तमान में विधायक होने के साथ ही कुशाभाऊ ठाकरे ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं। इधर, डॉ. नरोत्तम मिश्रा को भी प्रदेश अध्यक्ष का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। पार्टी ने उन्हें महाराष्ट्र चुनाव में भी अहम जिम्मेदारी दी थी। कई अन्य राज्यों में भी वे चुनाव प्रबंधन में लगाए गए थे। फिलहाल उनके पास कोई अन्य जिम्मेदारी नहीं है। इसलिए सामान्य वर्ग से मिश्रा को वजनदार दावेदार माना जा रहा है। एक और मुख्य दावेदार हैं लाल सिंह आर्य। अनुसूचित जाति के होने के कारण लाल सिंह आर्य भी बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष के दावेदार हैं। लाल सिंह आर्य लगातार दो चुनाव हारने के बाद भी संगठन में सक्रिय हैं और केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उनके नाम पर राजी हैं, जो उनके लिए बहुत अच्छा साबित हो सकता है। दावेदारों की लिस्ट में अगला नाम है भोपाल की दक्षिण-पश्चिम सीट से विधायक भगवानदास सबनानी का। संगठन और चुनाव दोनों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सबनानी भी संगठन को भा जाएं तो बहुत हैरत की बात नहीं होगी।
आदिवासी चेहरे भी चर्चा में
कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी में कोई भी चुनाव बहुत सारे फैक्टर देखने परखने के बाद होता है। फिर प्रदेश अध्यक्ष का पद तो पार्टी का सबसे महत्वपूर्ण पद है। पार्टी जातिगत समीकरण पर भी विचार करेगी। पार्टी में मुख्यमंत्री का पद अभी तक ओबीसी वर्ग को दिया गया है। संगठन में अभी कमान सवर्ण के हाथ में रही। मुमकिन है कि अगर बदलाव होता है तो पार्टी किसी आदिवासी चेहरे को भी इस पद पर मौका दे सकती है।
जो मोहन को मोह ले
इधर, संगठन के अहम सूत्रों का दावा है कि मप्र में प्रदेशाध्यक्ष सदैव मुख्यमंत्री की पसंद पर ही तय किया गया है और इस बार भी ऐसा ही होगा। जब तक शिवराज कुर्सी पर रहे तब तक उन्होंने प्रदेशाध्यक्ष के चुनाव में अहम भूमिका निभाई और अब, जब मोहन के हाथ में कमान हैं तब मोहन को मोहने वाला ही गद्दीनशीं होगा, ये तय है। हालाकि, सीएम ऐसा भी नहीं कर सकते कि अपनी एकतरफा मर्जी से ऐलान कर सकते हैं। उन्हें संगठन और सत्ता, दोनों में तालमेल बिठाना पड़ता है।
जैसे-जैसे देर होगी, घमासान बढ़ेगा
मध्य प्रदेश बीजेपी में यूं 5 जनवरी के बाद से ही प्रदेश अध्यक्ष के लिए चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जानी थी, लेकिन जिलाध्यक्षों की घोषणा में हुई देरी की वजह से आधा महीना तो जिलाध्यक्षों की सूची आने में लग गया, लेकिन माना जा रहा है कि जनवरी महीने के आखिर तक मध्यप्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष का एलान भी हो जाएगा। हालांकि जैसे-जैसे इस ऐलान में देरी हो रही है। पार्टी में दावेदारों के नए चेहरे सामने आ रहे हैं। जानकारों का मानना है विलंब की स्थिति में अध्यक्ष के चुनाव में घमासान बढ़ता जाएगा।
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