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    गर्मी का पारा चढ़ते ही वन क्षेत्रो में मंडरान लगा आग का खतरा

  • April 03, 2022

    • मप्र के जंगलों में सात दिन आगजनी की 17,709 घटनाएं

    भोपाल। एक तरफ देश में रिकॉर्डतोड़ गर्मी पड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ मप्र सहित सात राज्यों के वन क्षेत्र में आग धधक रही है। इस कारण वन्य प्राणियों पर खतरा मंडराने लगा है। भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार पिछले सात दिनों में 29 राज्यों में 60 हजार से ज्यादा आगजनी की छोटी-बड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इनमें सबसे ज्यादा मप्र में 17,709, छत्तीसगढ़ में 12,805, महाराष्ट्र में 8,920, ओडिशा में 7,130 और झारखंड में 4,684 आगजनी की घटनाएं हुई हैं। देश के कई राज्यों के जंगल में आग लगने से वन्य संपदा और वन्य जीवों के जीवन पर खतरा मंडराने लगा है। मप्र वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जंगल में आग पेड़ों के घर्षण से लगती है या फिर लोगों द्वारा लगाई जाती है। हर साल गर्मियों में आग के कारण हजारों हेक्टेयर जंगल स्वाहा हो जाता है। आग के कारण वन्य प्राणियों की मौत भी होती है। वहीं औषधीय और इमारती पेड़-पौधे खाक हो जाते हैं। इससे अरबों रूपए की चपत लगती है।


    मप्र में करीब 18 हजार घटनाएं
    मप्र में सघन वन क्षेत्र है। इसलिए यहां आग बड़ी तेजी से फैलती है। प्रदेश में पिछले 7 दिन में जंगल में आग लगने की करीब 17,709 से अधिक घटनाएं हुई हैं। वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बांधवगढ़ बाघ अभयारण्य में सबसे अधिक आगजनी की घटना दर्ज की गई हैं। सतना के जंगलों में भी आगजनी की लगातार घटनाएं दर्ज की जा रही है। वहीं अन्य क्षेत्रों में भी आग लगने की घटनाएं हुई हैं। प्रदेश के जंगलों में महुआ बीनने वाले लोग सूखे पत्ते में आग लगा देते हैं। इससे इस तरह की घटनाएं बढ़ रहीं हैं। एक्सपर्ट के अनुसार मार्च में सामान्य से अधिक तापमान बढऩे से आगजनी की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। जंगल में पेड़ों के सूखे पत्ते और टहनियां ईंधन का काम करते हैं। एक छोटी सी चिंगारी हीट का काम करती है। ऐसे में अगर हवा तेज चल रही हो तो एक जगह लगी आग पूरे जंगल को तबाह करने के लिए काफी है।

    इंसानी लापरवाही जंगल में आग का सबसे बड़ा कारण
    पेड़ की टहनियों में घर्षण और सूरज की तेज किरणें जंगल में आग लगने का कारण बनने के लिए काफी हैं, लेकिन इंसानों की लापरवाही के कारण जंगलों में आगजनी की सबसे ज्यादा घटनाएं होती हैं। दरअसल, लोग जंगल में शिकार करने या उत्पाद निकालने के लिए आग लगाते हैं। जैसे कि मध्यप्रदेश के जंगल में महुआ निकालने के लिए लोग झाडिय़ों में आग लगाते हैं। कई बार जंगल में जाने वाले लोग बीड़ी और सिगरेट पीकर बिना बुझाए फेंक देते हैं, इससे आग लग जाती है।

    कम बारिश भी आग का कारण
    आईएमडी के आंकड़ों के मुताबिक मार्च महीने में देश में 71 फीसदी कम बरसात हुई है। उत्तर पश्चिम भारत में 89 फीसदी और मध्य भारत में 87 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। ऐसे में जंगलों का पूरी तरह सूखा होना भी आग लगने की संभावना को बढ़ा देता है।

    आग बुझाने के लिए लगाई जाती है एक और आग
    आग बुझाने के लिए सबसे पहले ताप, ईंधन और ऑक्सीजन तीनों में से किसी एक को खत्म करने का प्रयास किया जाता है। पहाड़ों या घने जंगल में आग बुझाने के लिए कई बार आग का ही सहारा लिया जाता है। दरअसल, जिन जंगलों में पानी के स्त्रोत कम हो या फायर ब्रिगेड के पहुंचने में समस्या हो, वहां पारंपरिक तरीके से आग बुझाई जाती है। इसके लिए जंगल के जिस हिस्से में आग लगती है, वहां खाई खोदकर एक और आग लगाई जाती है। जैसे ही आग की लपटें खाई में लगाई आग तक पहुंचती है तो दोनों मिलकर शांत हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आग को जलने के लिए ऑक्सीजन चाहिए।खाई में लगाई गई दूसरी आग से वहां सीमित मात्रा में मौजूद ऑक्सीजन खत्म हो जाता है और आग बुझ जाती है।

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